Saturday, October 12, 2013

मेरी मेज ……

सुबह सबेरे जब 
मै पहुचता हूँ अपनी मेज पे 
वो मेरी कुर्सी मुझे घुरती सी है 
कभी अनकही आवाज में चिढ़ाती भी है 
अरमानों की जो डोली ले चले थे कभी 
उन्हें ना पाने की कशक जताती सी है. 

​अब तो वो वाक्या भी याद ना रहा 
सब कुछ पा के भी, दिल में बस इक मलाल ही रहा 
मजिल पाने के इरादों से बढे थे जिन रास्तों पर कभी 
वो अब बस सपनों  में ही याद  रहा 

साल-महीने इसी कशमकश मे गुजरे 
कभी चिल्ला पड़ा और कभी बस गुमसुम सा रहा 
हाँ.… मैं इन कागजों के ढेर में कही खो सा गया 
बटन दबाते-दबाते कही सो सा गया...I

दिन बीतते गये 
मेरी मेज पर कैलेंडर के पन्ने नए होते गये 
हर रोज बिखरते नये कागजों कि धूल 
मेरे इरादों की ज़मी पर परत दर परत जमते गये 

बस हर रोज मै अपने आप से लड़ता रहा  
हा…. मै अपने इस मेज पर कही खो सा गया 
बटन दबाते दबाते कही सो सा गया.……। 

Shashi kant Singh
Guwahai, Assam 

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