Tuesday, April 14, 2009

हम - सब...............

हम ये बात अच्छी तरह जानते है की भारत एक लोकतांत्रीक , प्रजातान्त्रीक, देश हैये ऐसा देश है जहाँ प्रतीनीधी जनता के द्वारा चुने जाते हैये वो देश है जहाँ जनता को अधीकार दीया गया है की वो अपना प्रतीनीधी ख़ुद से चुने
आज देश को आजाद हुएं 60 साल से भी ऊपर हो गयेआज हम उस जगह पर खड़े है जहाँ दुनीया हमारी लोहा मानने को मजबूर हैआज वीकसीत देशो को हमारी जरुरत का एहसास होने लगा हैलेकीन सवाल ये उठता है की क्या वास्तव में हम वीकास कर रहे है? इस पर गहराई से वीचार करना होगा नही तो ऐसा कहना मीथ्या ना होगा की हम केवल और केवल पशचीमी सभ्यता को अपनाकर वीकास का दीखावा और ढोंग कर रहे है
आजादी के 60 सालों के बाद भी हम अपने समाज को बदलने में असमर्थ हैआज हर नागरीक बिजली, पानी की बात करता है लेकीन वही नागरीक जब कोई सड़क की लाइट दीन में जलता देखता है तो उसे बंद करना जरुरी नही समझता , वही नागरीक जब सार्वजनीक स्थल पर कोई नल खुला देखता है तो उसे बंद करना जरुरी नही समझता
आज अगर कोई गलती से भी खुले मन से समाज की सेवा करने चलता है तो लोग उसे पागल कहते हैअगर ये सच है तो हमारे सारे करान्तीकारी पागल थे? जो हस्ते - हस्ते फाँसी के फंदे को चूम कर, अंग्रेजो के डंडे खा कर, जेल में रातें गुजार कर हमें आजादी दीलाई, क्या वो सब पागल थे - अगर हाँ तो आज हमारे देश को ऐसे ही पागलों की जरुरत हैं
हमें ऐसे खादीधारीयों की जरुरत नही है जो वोट की राजनीती करते हैं, जो वोट के लीये कंप्यूटर शिक्षा को बेकार बताते हैहमें ऐसे नेताओ की जरुरत नही है जो अंग्रेजी शिक्षा को बेकार बताते हैआज कोई अपने गावँ तक रेलवे लाइन बीछाता है, तो कोई आपने गावँ में इन्जीन्यरींग कोलेज खोलवाता है, कोई तो वोट के लीये Rs. 2/- per kg आनाज देने का वादा करता है, कोई बीजली मुफ्त में बाटता है, तो कोई बैंक का लोन माफ करता हैआज जीतना हर साल चुनाव में जीतना खर्च होता है अगर उसका 1/3 भाग भी वीकास में सच में खर्च कीया जाय तो सच में अपना देश अब तक वीकासशील से वीकसीत हो गया होता
आज चुनाव के समय हर पार्टी प्रचार में कलाकारों की सहायता क्यो लेता है आज कोई अपने कामो पर वोट क्यों नही मांगतासमस्या ये है की हम इनकी बातों में जाते है और इन्हे आधिकार दे देते हैगलती तो हम करते है और फीर दोष उनको देते हैउन्हें तो ये बात अच्छे से पता है की हम मुर्ख है लेकीन अब हमें जागना होगा नही तो हम ऐसे ही मुर्ख बनाये जायेंगेहमें ये साबीत करना होगा की हम मुर्ख नही है हम भी जाती, धर्म, से ऊपर उठ कर सोच सकते है, हमें ये साबीत करना होगा की लोकतंत्र का मतलब "जनता को, जनता के द्वारा, जनता के लीये चुनी गई सरकार ही है की नेताओं को, जनता के द्वारा दीया गया अधीकार है "
हमें ये सोचना होगा की ...............
तूफान की जद में है मजबूत ईमारत भी,
ऐसा तो नही है की केवल तीनके ही बीखरते है,
लोग हालत के आगे ख़ुद को बदलते है,
और एक हम है जो ख़ुद अपने हालत बदले है..................
Shashi kant singh

Thursday, April 9, 2009

Rishto ki ahamiyat

पल - पल महकतीं रीश्तों की खुशबु, लम्हा - लम्हा गुजरते खुशीयों के पल -----
कभी मीठी तकरारे, कभी मीठे जज्बात और उससे भी कही खास होता है अपनों का प्यार, जो ईट - गारे के मकान को घर बना देता है। अपनों के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला देता है ..........
अगर ये रिश्ते इतने अटूट न होते, ये बंधन इतने प्यारे नही होते तो बच्चो के लिये माँ यूँ रात - रात भर जागकर लोरी न सुनती, पापा घंटो साथ टहल कर, उंगली पकड़ कर चलाना न सिखलाते।
पर ऊमर भर रिश्तो को ऐसी ही अहमियत मिले, ऐसा कहा होता है। कभी - कभी छोटी - सी तकरार ही अहम मुद्दा बन जाती है, तो कभी खून के रीश्तों में ही इतनी कड़वाहट आ जाती है कि साथ रहना भी मुश्किल हो जाता हैं ......
और पछतावा तब होता है जब बहुत कुछ खो जाता हैं। इसलिए रिश्तों की अहमीयत को समझना बहुत ही जरुरी हैं।
रिश्तों की बगिया उमर भर महकाए रखना कोई मुश्किल काम नही हैं। बस हमें इतनी कोशिश करनी होती है की हम अपने रिश्तों की डोर में गांठ न पड़ने दे। मन में कोई ऐसी बात न आने दे जो दिलों के फासलें की वजह बने। रिश्तों में इतनी दुरी न आने पायें की साथ रहते हुए भी एक का दर्द दुसरे तक न पहुंचे।
यदि अपना थोड़ा - सा वक्त उन रिश्तों को दे पायें, उनकी छोटी - छोटी खुशीयों की क़द्र कर सकें, तो दिलों की दूरियों की वजह ही नही होगी।
रिश्ते जींदगी के लीये होते है, जींदगी रिश्तों के लीये नही ...............................