Wednesday, June 8, 2016

तकरार-ऐ-जिंदगी

देर शाम सोते है, सुबह जल्दी जगते  है,
हर रोज ऐ जिंदगी तुझसे लड़ते रहते है,
कभी तु मुझपे भारी पड़ती,
कभी मैं तुझपे काफी पड़ता।।

तु मुझमे जीती हो या मैं तुझसे जिन्दा हूँ,
बस यही सोचता रहता हूँ।
तारीखे बदलती जाती है
और मैं ऐ जिंदगी तेरे साथ बस नाचता जाता हूँ।

हर रोज सोचता हुँ ,
आज बेटे संग थोड़ा खेलूंगा
कभी सोचता हूँ,
आज पापा संग बैठ कर चाय पिऊंगा,
शाम को फुरसत में
माँ से लम्बी बाते करूँगा
बस सोचता हूँ, सोचता हूँ, सोचता ही रहता हूँ।

ऐ मेरी जिंदगी, तुझसे गुस्सा होता हूँ,
तुझपे चिल्लाता भी हूँ,
फिर भी ना जाने क्युँ,
तेरे लिये ही भागता रहता हूँ।
तुझे तो जीत के भी हारता हूँ
और हार के भी जीता हूँ।

काश !!
तु आज भी छोटी होती रे
हम आज भी पापा की अंगुली पकड़कर चला करते.
माँ हमें प्यार करती,
दादी हमें परियों के देश घुमाती

ना मैं तुझसे तकरार करता
और ना ही तुम मुझे नचाती।।

Shashi Kant Singh


Thursday, January 28, 2016

बिखरते रिश्ते

कुछ समझने चला हुँ 
कुछ जानने चला हुँ  
दुनिया मुझे फिर से अपनी लगे 
ये ख्वाब संजोये चला हुँ 

ये दुनिया तो पहले ऐसी न थी 
पैसों के पीछे भागती यहाँ हरएक बस्ती न थी
हम हर रोज आगे बढ़ते रहे,
अपने पीछे छुटते रहे,
सब पाने की चाह में
हमारे घरौंदे दिन ब दिन सिमटते रहे,

मतलबी इंसानियत हुई,
मतलबी सारे रिश्ते हुए,
ऐ दुनिया तेरी पनाह में,
इंसान भी आज जानवर हुए. 

चाहत की दिवारे मोटे होने लगे,  
रिश्ते कब्रो में दफन होने लगे, 
पहचान बनाने के लिए हम लड़ते रहे   
अपनों में पहचान खोने लगे.  

आज रिश्तो की चादर को सिलने चला  हू 
बिखरते रिश्तों की डोर को जोड़ने चला हुँ,
तू मुझे फिर से वही प्यारी लगे,
ऐ  मेरी दुनिया तुझे फिर से संजोने चला हू।