Wednesday, July 29, 2009

आंखिर हमलोग कब सुधरेंगे.........!!!!!

गंगा किनारें की वो सुनहरी शाम का ढलता सूरज और खेतों में फैली दूर-दूर तक हरियाली, मछुआरों का धीरे-धीरे अपना जाल समेटना तथा किनारे वाले पीपल के पेड़ पर बने आसियाने में पंछियों का लौटना। उनके बच्चों की खुशियों से भरी चहचहाहट पुरे वातावरण को रोमांचकारी बनने के लिए काफी था। जो मुझे अक्सर अपनी तरफ खीच लेता था।
बिहार राज्य के बक्सर जिले में गंगा किनारे पर बसा मेरा गावं मझरिया अपनी सादगी के लिए पुरे जिले में मसहुर हैं। जब मैं अपने इस प्यारे से गावं में रहा करता था तो रोज शाम को गंगा के किनारे की इस खूबसूरती की तरफ खीचा चला आता था। आज समाज और पेट की चिंता के चलते मुझे अपने इस प्यारे से गावं को छोड़ कर शहरों की उन भीड़-भरी सडको और उन तंग गलियों में बने उन तंग घरो में घूमने और रहने को मजबूर कर दिया।
अपने उस गावं में मैं जब भी शाम को गंगा के किनारे निकलता था तो मैं उस पीपल के पेड़ के निचे जरुर जाता था और वो पीपल भी मेरे जाने के बाद अपने पत्तो को हिलाने लगता था मानो कह रहा हो की मेरी छावं में आपका स्वागत है। मैं भी वहां पर रुक कर उस पर बसे पछियों की चहचहाहट का आनंद लेने लगता था। अब तो वो मेरे रोज की दिनचर्या में भी शामिल हो गया था।
एक दिन मैं पीपल के पेड़ पर नजदीक में बने इक तोंते के घोसले में दो छोटे-छोटे बच्चों को देखा। दोनों अपने चोंच को फैलाये अपनी माँ का इंतजार कर रहे थे। तभी थोडी देर बाद उनकी माँ आ गई और दोनों बच्चों को प्यार करने लगी। ये देख कर मेरा रोम-रोम खुसी से भर गया। उसके बाद मैं रोज वही जा कर बैठने लगा। अनायास ही मुझे उनसे लगाव हो गया था. मैं बेसब्री से शाम का इंतजार करता था और शाम होते ही उनसे मिलने चला जाता था।
एक दिन मैं रोज की तरह वहा जा कर बैठा था, साँझ ढल रही थी, मंद मंद हवा चल रही थी और मैं भी उन बच्चों के साथ उनकी माँ का इंतजार करने लगा। धीरे - धीरे अँधेरा होने लगा था लेकिन उनकी माँ नही लौटी थी। पेड़ पर सारे पंछी खुश थे, चहचहा रहे थे मगर उन बच्चों के घोसले में सन्नाटा पसरा था। उनकी इस दसा को देख कर मेरा भी जी घबरा रहा था लेकिन मैं कर भी क्या सकता था।
अब अँधेरा ज्यादा होने लगा था। मैंने अपने जेब से टौर्च निकला और बुझे हुए मन से घर की तरफ़ आने लगा। अभी पीपल के पेड़ से थोडी ही दूर निकला था की अचानक मेरे पैर ठिठक गये। मेरे सामने उनके माँ की लहूलुहान शरीर पड़ी थी। शायद किसी ने उसे गुलेल से मारा था और वो अपने बच्चों से मिलने के लिए भागी थी और पेड़ के थोड़े ही दुरी पर गिर गई थी। मुझे लगा की वो अभी जिन्दा थी और मैंने तुंरत उसे लेकर गंगा नदी के पास भागा और उसके मुहं में गंगा जी की दो-चार बूंद पानी डाला लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और वो अपने उन बच्चों को छोड़ कर जा चुकी थी।
मैंने वही नदी के किनारे थोड़ा मिटटी खोद कर उस दफना दिया। और वापस चलने के लिए मुडा,और सोचा की चलो उन बच्चों थोड़ा देख लू की तभी सामने खड़ा पीपल का पेड़ मुझ पर हसता हुआ दिखाई दिया। मानो वो कह रहा हो अब क्यों आ रहे हो इधर। उन बच्चों को मारने या मरते हुए देखने? मुझे लगा की वो कह रहा है की उसने तुम्हारा क्या बिगाडा था। अरे जितना वो खाता था उसका कई गुना तो तुमलोग रोज फेक देते हो। फिर भी तुमलोगों उसे मार दिया। अरे तुम लोग तो नमक हराम हो जिस डाल पर बैठते हो उसी को काट देते हो।
अब मेरे आंखों से आंसू निकलने लगे थे। मुझे लगा की वो मुझे कोस-कोस के बोल रहा है की अरे तुम लोग क्या समझोगे दुसरो की पीडा? तुमलोग तो अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी मार और उखाड़ सकते हो।
अब मुझे ही देखो, मैं तुम लोगो को कितनी छाया देता हूँ लेकिन अपने स्वार्थ के लिए मुझे भी तुम लोग काट दोगे।
लेकिन इक बात तुम लोग भी याद रखना "समुद्र की खामोसी तूफान का सूचक होती है"। इक दिन ऐसा आयेगा जब तुम्हे हमारी जरुरत का पता चलेगा और तुम्हारे पास हाथ मलने की सिवा कुछ नही बचेगा।
सचमुच उस दिन मैं खूब रोया और पुरी रात सो न सका। हर बार मन में बस इक ही सवाल गूंजता रहता "आंखिर हमलोग कब सुधरेंगे"

Thursday, May 14, 2009

मेरी माँ............


अभी बीते हुए 10 मई, 2009 को हमारे कॉलेज में Mothers Day मनाया गयाहमने भी भाग लियाहमलोगों ने इस शुभ अवसर पर एक नाटक भी किया जिसका शीर्षक था - कुलीनाटक दिल को छूने वाला थाहमारे सभी मित्रों ने इस प्रोग्राम को सफल बनाने में अपना बहुमूल्य समय दिया
माँ..............
जब ईश्वर स्वयं धरातल पर न आ सका तो उसने माँ को भेजा। 'माँ' इस धरा की सबसे अनमोल उपहार हैं। माँ हमें जीवन देती हैं, हमें अपने पैरों पर खड़ा होना, अपने हाथों से खाना - खाना, सिखाती है। अगर इस जहाँ में कोई निश्छल प्यार करने वाला हैं तो वो माँ ही है। बचपन से लेकर जवानी तक जब भी हमे कोई तकलीफ होती है तो मुहँ से बस इक ही आवाज निकलती हैं ओह्ह्ह्ह माँ..... । माँ कितनी भी गहरी नींद से क्यों न सो रही हो अगर उसके कानो में उसके बेटे की बस इक आवाज "माँ तुम कहाँ हो" पहुचती है तो वो तुंरत जग जाती हैं, थोडी भी आलस नही करती
मेरी माँ हमेशा मेरे लिए किसी त्यौहार पर कुछ खास बनाया करती थी और मै हमेशा उसमे कुछ न कुछ कमीनिकला देता था। माँ का हँसता हुआ चेहरा मायूस हो जाता था और मैं ये बात उस समय समझ नही पता था। आज जब माँ के उस हाथ के खाने को तरसता हूँ तो आँखों में आंसू आ जाते हैं।
ऐसे मौके कितनी बार आए होंगे जब मैं माँ को बोल दिया करता था की "मम्मी आपका दिमाग ख़राब है, मम्मी प्लीज जब आपको नही पता तो चुप रहियें"। कभी - कभी तो माँ बोलती की हाँ अब हमने तुम्हे पढ़ा-लिखा कर बड़ा कर दिया तो हमें कहाँ से पता चलेगा, तो कभी चुप रह जाती थी। लेकिन आज जब वो सारी बाते सोचता हूँ तो ख़ुद पर गुस्सा आता है।
जो माँ मेरी कितनी गलतियों को छुपा जाती थी, कितनी बार तो मेरे चलते पापा से डाट भी सुनती थी, जो माँ मेरे पास होने पर मन्दिर में भोग लगाती थी, उस माँ को मैंने कितनी चोट पहुचाई।
मुझे आज भी याद है जब मै भुबनेश्वर पढने आ रहा था मेरी माँ दरवाजे से मुझे देख रही थी आखों में आसूं थे फिरभी हँस रही थी लेकिन मैंने माँ के अन्दर इक माँ को रोते हुए देखा था लेकिन क्या करता जिंदगी में कुछ चीजे ऐसी होती है जिस पर अपना कोई अधिकार नही होता।
अब तो ख़ुद को ही दिलासा दिलाता हूँ की बस इक बार मौका मिले तो माँ को इतना प्यार करू की माँ हर जन्म के लिए बस मेरी सिर्फ मेरी माँ हो जाए।

मैंने कुछ पंक्तिया भी अपनी माँ के लिखी थी जो आपके साथ भी शेयर कर रहा हूँ..................
माँ......
मै
तुझे हमेशा याद करता हूँ,
जब
याद तुम्हारी आती है आखों में आंसू जाते है,
तो
कभी तन्हाई के इस आलम में दिल को सुकून दे जाते हैं
माँ......
वो
 तेरा बचपन का प्यार,
शरारत
करने पर डंडे की मार,
गुस्से
में मेरा खाने से रूठना और
तेरा
दादी को भेज कर मुझे मनाना
उन
पलों को आज भी याद करता हूँ,
माँ मैं तुझे हमेशा याद करता हूँमाँ......
जब
तू कुछ खास बनाती थी मेरे लिए
मै
हमेशा उसमे कुछ कमी निकाला करता था,
तेरे उस उदास चहरे की अहमियत
मैं
नही समझ पता था
आज
जब तरसता हूँ उस खाने के लिए,
तो
 फुट-फुट कर रोता हूँ, 
तेरे
उन हाथों से खाने को मचलता हूँ
माँ
मैं तुझे बहुत याद करता हूँमाँ........
आज
जब कभी बहुत खुश होता हूँ,
तो
तेरी तस्वीर के आगे हँसता हूँ
जब
रोने का जी करता है तो
तेरी
तस्वीर से छुप कर रो लेता हूँ
तुझे
मेरी ये दशा पता ना चले इसलिए
हर
रोज फ़ोन से बातें किया करता हूँ,
पर
अन्दर ही अन्दर मैं रोया करता हूँ,
सचमुच
इक तू ही माँ जिसे मैं हमेशा याद किया करता हूँ


Shashi Kant Singh
School of Rural Management
KiiT University
Bhubaneswar



Tuesday, April 14, 2009

हम - सब...............

हम ये बात अच्छी तरह जानते है की भारत एक लोकतांत्रीक , प्रजातान्त्रीक, देश हैये ऐसा देश है जहाँ प्रतीनीधी जनता के द्वारा चुने जाते हैये वो देश है जहाँ जनता को अधीकार दीया गया है की वो अपना प्रतीनीधी ख़ुद से चुने
आज देश को आजाद हुएं 60 साल से भी ऊपर हो गयेआज हम उस जगह पर खड़े है जहाँ दुनीया हमारी लोहा मानने को मजबूर हैआज वीकसीत देशो को हमारी जरुरत का एहसास होने लगा हैलेकीन सवाल ये उठता है की क्या वास्तव में हम वीकास कर रहे है? इस पर गहराई से वीचार करना होगा नही तो ऐसा कहना मीथ्या ना होगा की हम केवल और केवल पशचीमी सभ्यता को अपनाकर वीकास का दीखावा और ढोंग कर रहे है
आजादी के 60 सालों के बाद भी हम अपने समाज को बदलने में असमर्थ हैआज हर नागरीक बिजली, पानी की बात करता है लेकीन वही नागरीक जब कोई सड़क की लाइट दीन में जलता देखता है तो उसे बंद करना जरुरी नही समझता , वही नागरीक जब सार्वजनीक स्थल पर कोई नल खुला देखता है तो उसे बंद करना जरुरी नही समझता
आज अगर कोई गलती से भी खुले मन से समाज की सेवा करने चलता है तो लोग उसे पागल कहते हैअगर ये सच है तो हमारे सारे करान्तीकारी पागल थे? जो हस्ते - हस्ते फाँसी के फंदे को चूम कर, अंग्रेजो के डंडे खा कर, जेल में रातें गुजार कर हमें आजादी दीलाई, क्या वो सब पागल थे - अगर हाँ तो आज हमारे देश को ऐसे ही पागलों की जरुरत हैं
हमें ऐसे खादीधारीयों की जरुरत नही है जो वोट की राजनीती करते हैं, जो वोट के लीये कंप्यूटर शिक्षा को बेकार बताते हैहमें ऐसे नेताओ की जरुरत नही है जो अंग्रेजी शिक्षा को बेकार बताते हैआज कोई अपने गावँ तक रेलवे लाइन बीछाता है, तो कोई आपने गावँ में इन्जीन्यरींग कोलेज खोलवाता है, कोई तो वोट के लीये Rs. 2/- per kg आनाज देने का वादा करता है, कोई बीजली मुफ्त में बाटता है, तो कोई बैंक का लोन माफ करता हैआज जीतना हर साल चुनाव में जीतना खर्च होता है अगर उसका 1/3 भाग भी वीकास में सच में खर्च कीया जाय तो सच में अपना देश अब तक वीकासशील से वीकसीत हो गया होता
आज चुनाव के समय हर पार्टी प्रचार में कलाकारों की सहायता क्यो लेता है आज कोई अपने कामो पर वोट क्यों नही मांगतासमस्या ये है की हम इनकी बातों में जाते है और इन्हे आधिकार दे देते हैगलती तो हम करते है और फीर दोष उनको देते हैउन्हें तो ये बात अच्छे से पता है की हम मुर्ख है लेकीन अब हमें जागना होगा नही तो हम ऐसे ही मुर्ख बनाये जायेंगेहमें ये साबीत करना होगा की हम मुर्ख नही है हम भी जाती, धर्म, से ऊपर उठ कर सोच सकते है, हमें ये साबीत करना होगा की लोकतंत्र का मतलब "जनता को, जनता के द्वारा, जनता के लीये चुनी गई सरकार ही है की नेताओं को, जनता के द्वारा दीया गया अधीकार है "
हमें ये सोचना होगा की ...............
तूफान की जद में है मजबूत ईमारत भी,
ऐसा तो नही है की केवल तीनके ही बीखरते है,
लोग हालत के आगे ख़ुद को बदलते है,
और एक हम है जो ख़ुद अपने हालत बदले है..................
Shashi kant singh