Tuesday, December 27, 2011

फासले इंसानियत के

 कही आँखों में चमक, तो कही फिकी है चेहरे की मुस्कान,
कही कुछ करने की चाहत, तो कही गुम है दिल के अरमान,
हवा भी सहम सी जाती है,
तय करती है जब ये रास्ता वीरान.

एक तरफ दौड़ है एक तरफ बेबसी
एक तरफ है मंजिले जहाँ हर तरफ है ख़ुशी,
दूजा लाचार है, जिसके सपने भी अपने नहीं,

पौ फटते ही रोटी को बच्चे चिल्लाते रहे,
और वो अपने बेबसी पर आंसू सुखाते रहे.
कुदरत भी इन्ही पर सितम ढाते रहे,
और लोग इनकी लाशो पर भी सिक्के भुनाते रहे.
इसे हैवानियत कहे या पुरानी दस्तूर 
जब इन्सान ही इन फासलों को बढ़ाते रहे 

खादी कुरता हो या कोई ओहदा बड़ा,
सारे बढ़ते आंकड़ो को गिनाते रहे,
इनसे रहमत की आशा लिए वो,
इनके शोषण को भी अपनी किस्मत समझते रहे.
उस तरफ इमारते खडी होती रही,
इधर झुग्गी में दिए जलते रहे,
इन्हें इन्सान ही कहे या खुदा का फरिस्ता 
जो खुद के मेहनत से उनकी इमारत जगमगाते रहे,

और वो बस अपनी टूटी जिंदगी की गाड़ी को खीचते हुए
उन की खिड़की को दूर से चुपचाप निहारते रहे.

Shashi kant Singh

Monday, July 25, 2011

दादा जी की चप्पल


कमरे के बाहर,
किनारे में, सलीके से, सहेज कर,
रखी रहती थी, मेरे दादा जी की चप्पल।

अपने दामन में
इस जिंदगी के सुख - दुःख,
राहो में मिले दर्दो को समेटे,
निश्छल भाव से साथ निभाती थी,
मेरे दादा जी की चप्पल।

रोज सुबह एक नई अंगड़ाई लेती,
अपने दरारों की फिक्र किये बिना,
उनके साथ चुपचाप हो लेती थी,
मेरे दादा जी की चप्पल।

कभी -कभी थोड़ी शर्माती थी जब लोग,
उसमे पड़े दरारों से घूरते थे,
मगर किसी नई दुल्हन की तरह,
उनके दामन में खुद को समेट लिया करती थी,
मेरे दादा जी की चप्पल

अभी कल ही, दादा जी ने,
उन जख्मो को भरने की कोशिश की थी,
राहों में मिले घावों पर थोड़ी,
मरहम पट्टी करवाई थी,
खुद पर इठलाती, थोड़े ही दिन के लिये सही मगर,
जवान दिखने की कोशिश कर रही थी,
मेरे दादा जी की चप्पल।

एक दिन अचानक,
अपने आसपास बहुत सारे,
चप्पलो को महसूस किया उसने,
किसी को कमरे के बाहर तो किसी को,
तेजी से दादा जी के कमरे में घुसते देख रही थी,
सब के चेहरे की उदासी को ताड़,
खुद के नसीब पर रोती रही,
मेरे दादा जी की चप्पल

अगले 13 - 14 दिन तक,
बहुत सारे चप्पलों के बिच, पिसती रही थी वो,
कभी इस कोने में, तो कभी उस कोने में,
कभी किसी रेक पर फेकी जाती,
सारे दुःख चुपचाप सहती रही
मेरे दादा जी की चप्पल

फिर एक ऐसी सुबह आई,
जब किसी अनजान मुशाफिर के झोले में,
आँखों में ढेरों आंसू और दिल में दफन यादों को लिये,
मेरे घर को निहारती चली जा रही थी
मेरे दादा जी की चप्पल

चिल्लाती रही,
बिलखती रही,
मानो समझाने की कोशिश कर रही हो,
मुझे बस उनके कमरे के किसी कोने में पड़े रहने दो,
मुझे रोक लो, मुझे न जाने दो,
और आखिर में अपने को किस्मत के हवाले
छोड़ दी मेरे दादा जी की चप्पल।

Shashi Kant Singh

Friday, June 24, 2011

मेरी जिंदगी

अनजाने रास्तों पर,
भागती, कभी फिसलती,
फिर खुद ही सम्भलती,
अनजाने में बने कुछ रिश्तों की आड़ में,
थोड़ी सुस्ताती, ये मेरी जिंदगी।
एक अनजान मंजिल कि तरफ,
बढती ये मेरी जिन्दगी।

आँखों में लिये कुछ सपने,
दिल में संजोये कुछ उम्मीद,
साथ में लिये किसी की ढेरों आशाएं,
दामन में लपेटे हुए किसी के ढेरों आशीर्वाद,
मुश्किलों का सामना करते हुए,
कभी रिश्ते बनाते, कभी रिश्ते को तोड़ते,
कभी रिश्तों की नज़रों से खुद को छुपाते,
बस आगे, आगे बढती जा रही मेरी जिन्दगी।

खुद की खुशियों को भूल चूका है वो,
अपनो  से कब-का नाता तोड़ चूका है वो,
कभी-कभी अकेले में,
अपनी जिन्दगी के मायेने खोजता है वो,
लोग तो कहते है कि बहुत नेक दिल है वो,
मगर खुद का दिल तो कब का तोड़ चूका है वो,

यादों को दामन में समेटे,
जख्मो को आंसुओ में डुबोती ये मेरी जिंदगी,
कभी रिश्तों को बनाती, कभी रिश्तों को छोडती,
अनजान मंजिल कि तरफ बढती,
ये मेरी जिंदगी...............


Shashi Kant Singh

Sunday, April 24, 2011

बोया पेड़ बबुल का

"गुरु ब्रम्हा, गुरु बिष्णु, गुरु देवो महेश्वर
गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मयी श्री गुरुवे नमः"
इतिहास के पन्नो में गुरु की उपाधि सर्व श्रेस्ठ हैं। गुरु वो है जो एक अच्छे समाज का निर्माण करता है। गुरु वो कुम्हार है जो समाज रूपी घड़े को एक आकर/रूप प्रदान करता है। हमारे शास्त्रों में ऐसे प्रमाण मिलते है कि गुरु की ललाट हमेशा ज्ञान से चमकती रहती थी, उनके आश्रम ऐसे शांत जगह पर होते थे जहाँ विधा की सरिता बहती थी और शिष्य भी संत की तरह रहते थे और शिक्षा ग्रहण करते थे। चाहे वो एक राजा का राज कुमार हो या एक प्रजा के आँखों का तारा। गुरु भी सभी को ज्ञान सामान रूप से बाटते थे। उनका बस एक ही सोच होता था - "ज्ञान बाटना" क्योकि वो जानते थे कि शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो मनुष्य को तरक्की के पथ पर अग्रसर करता है।
इतिहास गवाह है कि बिहार हमेशा से विद्वानों को पैदा करने की धरती रही है जहाँ राजेंद्र प्रसाद, महान गणितज्ञ वशिस्ठ नारायण तथा तथागत अवतार तुलसी जैसे विद्वान पैदा हुए। मगर आज दिन-ब-दिन शिक्षा का गिरता स्तर और शिक्षा पर होती जा रही गन्दी राजनीती, राज्य में मौजूद युवा शक्ति और आने वाली पीढ़ियों के लिये बेहद खतरनाक बनती जा रही है।
अगर आज के परिवेश की बात करे तो विधालय ऐसे नहीं रहे जहाँ सिर्फ विधा की देवी माँ सरस्वती का वास होता है, गुरु वो नहीं रहे जिनका मकसद केवल ज्ञान बाटना होता है और शिष्य भी वैसे नहीं रहे जिनका मकसद केवल ज्ञान हासिल करना होता है। आज तो विधालय केवल भोजनालय बन कर रह गये है, गुरु ऐसे 'शिक्षा मित्र' में परिवर्तित हो गये है जो शिक्षा का मित्र ना होकर सरकार के मित्र हो गये है जो केवल कभी जनगणना, तो कभी चुनाव में लगे रहते है, और संयोग से कोई बच जाता है तो वो स्कुल के भवन निर्माण का ठेकेदार बना दिया जाता है। शिष्य की क्या बात करनी जब स्कुल में गुरु ही न हो मगर ये जरुर है कि शिष्य अपने समय से खाने का थाली के साथ खाने के समय हाजिर हो जाता है। ये बात अलग है कि उस खाने को खा कर बहुत शिष्य बीमार भी पड़ जाते है। भले स्कुल जाये या ना जाये मगर जब साईकिल और पोशाक के पैसे बाटें जाते है तब अपने हक़ को जताने पास के शहर में भी पहुच जाते है.
कही - कही हालात ये हैं कि शिष्यों की वर्तमान संख्या से तीन - चार गुना अधिक शिष्यों का नाम स्कुल की कुंजी में दर्ज मिलता है, जिसको देख कर सरकार अपनी पीठ थप-थापती है कि स्कुल में शिष्यों की संख्या में इजाफा हुआ है और उसी को देख उन स्कुलो में राशन उपलब्ध कराती है और गुरु जिसको समाज पहले पूजता था उसी को भ्रष्ट बनने के लिये प्रेरित करती है।
वो गुरु भी भ्रष्ट क्यों ना हो, जब वे खुद उन पंचायत मुखियों के रहमो करम पर चयनित हुए है जिनमे अधिकांशतः को एक प्रपत्र पढ़कर समझने कि कूबत नहीं है मगर कहा पर और किस काम में गाढ़ी कमाई है उसको अच्छी तरह से समझ जाते है। अचम्भा तो तब होता है जब महान जनमत से बनाई गई ये सरकार उनके हाथो से चयनित गुरुओं के बल पर एक मजबूत और शिक्षित युवा शक्ति की कल्पना करती है।
रोचक अनुभव:
अभी हाल में ही खगड़िया जिले के एक स्कुल के कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। संयोग कुछ ऐसा रहा की मै पूर्व निर्धारित काम से उस गावं में पहले ही पहुच गया। सोचा चलो थोडा स्कुल भी घूम लू। पता चला की अभी परीक्षा चल रही है। मै बस ऐसे ही एक कमरे में चला गया और जो देखा उसकी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी।
सामने ब्लैक बोर्ड पर सारे प्रश्नों के उत्तर लिख कर गुरु जी गायब थे और शिष्य उसे उतारने में लगे थे । कुछ तो उसे और अच्छा से लिखने के लिये अपने पास मौजूद सामग्री का सहारा भी ले रहे थे। ये बात अलग है की मुझे देख कर शिष्य लोग उन सामग्री को छुपाने लगे थे। अभी मै अन्दर घूम ही रहा था कि बाहर कुछ शोरगुल और थाली के खनखनाने की आवाज सुनाई दी। और मै बाहर आ गया। बाहर का नजारा दिल दहलाने वाला था। जहाँ एक तरफ एक गुरूजी छड़ी के सहारे उन छोटे - छोटे शिष्यों को कतार में लगा रहे थे तो दूसरी तरफ दरवाजे से उन थाली/कटोरों में थोड़ी-थोड़ी खिचड़ी डाली जा रही थी। इधर सामने बरगद के पेड़ के निचे किसी-किसी कटोरे में २-३ नन्हे शिष्य बैठ कर खा रहे है और सामने बन रहे भवन के लिये मौजूद पानी की पाइप से पानी पिने के लिये झगड़ रहे है।
सहसा दिमाग में बी बी सी के उस खबर की याद आ गई जब बिल गेट्स ने एक ऐसे ही स्कुल का दौरा किया था और सारे शिष्यों के साफ-सुथरे पोशाक तथा उनके हाथो में चमचमाती थाली को देख कर उनके मुहँ से "अदभुत" निकला था। मन तो किया कि उन्हें यहाँ भी भ्रमण करने का न्योता दे दू जिससे इन शिष्यों को थोड़ी बहुत रहत मिले। मगर सोचा कि कितनी जगह घुमाऊंगा।
अगर देखे तो इसके जिम्मेदार तो हम खुद भी है। ये सरकार तो हमने ही बनायीं है ना। ये तो हमारे द्वारा चुने गये सेवको की कारलिला है। जो दिखाने को तो एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगते है और दूसरी तरफ एक के द्वारा लगाये गये काटों से भरे पौधे को पीछे से पानी भी देते है।
उनके खुद के तो बच्चे किसी विदेशी स्कुल में अच्छी शिक्षा हासिल कर रहे होते है। नुकसान तो एक गरीब के उस बच्चे का होता है जिसके माता पिता दो जून की रोटी की जुगाड़ में परेशान होते है और मौका मिलने पर अपने बच्चे की पढाई बंद कर काम पर ले कर चल देते है। मगर अचम्भा तब लगता है जब सरकार हकीकत से परे, बस आंकड़ो में उलझ कर इसे विकास की रफ्तार का नाम देती है।
और आम जनता हर सालअपने मन को कोसती रहती है कि मैंने क्यों बोया पेड़ बाबुल का......
Shashi kant Singh

Tuesday, February 8, 2011

आया ऋतुराज बसंत


फुले सरसों के फूल, मधु लेकर पंहुचा अनंग,
हमारे आँगन में पंहुचा, देखो ऋतुराज बसंत।

खोलो दिल के दरवाजे, भूलो सारे द्वेष भरी बातें,
भरो मन में उत्साह, ख़ुशी और उमंगो के साथ,
छेड़ो मस्ती की धुन, बाटों खुशियाँ अपार,
गले लगाओं, देखो आया ऋतुराज।

देखो बगिया में कोयल मधुर तान छेड़े है,
गावं में गोरी अब, सलीके से दुप्पटा ओढ़े है,
भाभियों की कलाइयाँ चूड़ियों से भरी है,
तो देवरों की मुट्ठी, रंगों से भरी है,
दुर चौपाल पर,
दादा जी की टोली, अपनी फाग धुन छेड़े है,
सबको गले लगाओ आज,
देखो आँगन में आ गया ऋतुराज।

Shashi kant singh

Friday, January 7, 2011

तलाश....रिश्ते की


थामे रिश्ते की डोर, मेरा ये जीवन शुरू हुआ,
रिश्तों की अंगुली पकड़, मै धरा पर चलना शुरू किया,
रिश्तों के लिये, रिश्तों से जुड़ता चला गया,
रिश्तों के खातिर, मैं रिश्ता निभाना शुरू किया।

रिश्तों की भीड़ में, तलाशा एक परछायी को,
इतराया गर्व से खुद पर, पाकर उस रिश्तें से प्यार को,
लगा मिल गई है मंजिल मुझे, इस जीवन के मजधार में,
ऐसा लगने लगा, लोग जलने लगे है मेरे इस रिश्ते के नाम से।

समय के साथ, रिश्तों के मायने बदलते चले गये,
मेरी परछायी को वो अँधेरा बन, ढकते चले गये,
मुझे पता न चला, कब मेरी परछायी पीछे छुट गई,
मै तो वही खड़ा रहा, मगर वो रिश्ता मुझसे रूठ गई।

अगली सुबह,
उसी मोड़ पर मै, रिश्तों के अरमानो को निभाता रहा,
उन रिश्तों के बीच, अपनी उस परछायी को तलाशता रहा,
फिर से वो शाम आई,
मगर वो रिश्ता मुझे नजर ना आई....
वो रिश्ता मुझे नजर ना आई।


Shashi Kant Singh