Wednesday, December 12, 2012

मेरे ख्वाब

We all dream to achieve something one day no matter what, and if we stop dreaming we stop living. So here I’m chained with my dreams by these heavy chains which are blocking me of achieving what I want; however, I still insist to fight for my dreams to make them come true ..

ये ख्वाब भी अजीब है,
हर रोज एक नयी चादर लपेटे आते है,
कुछ तो मन के रास्ते दिल को छुते  है,
कुछ बीच रास्ते में ही छुट जाते है।

जिन्दगी में कुछ ख्वाब हमने भी देखे थे,
उनके साथ रास्तों पर थोडा आगे भी बढे थे,
तभी सामना उन ख्वाबो से पड़ा,
जिन्हें मेरे लिए मेरे अपनों ने देखे थे,
उन्हें पूरा करने की चाहत में
हम तो खुद की जिन्दगी में ही भूले थे।

दोस्ते ने समझाया
खुली आँखों से जीना सीखो
जो डगर तुमको दिखे,
उस डगर को अपना बनाना सीखो,
मगर उन्हें कैसे यकीं दिलाता,
वो डगर भी एक ख्वाब का आइना था,
हकीकत में उस पर भी अपनों का साया था।

मेरे नसीब में उनका ख्वाब था,
जिनकी महफिल में ताउम्र मुझे घुंघरू  बजाना था,
जहाँ निगाहे मेरे पैरो की बेड़ियों पर नहीं,
इशारो पर थिरकते मेरे कदमो पर था।

शशि कान्त सिंह 

Tuesday, July 10, 2012

...अकेला

मै अकेला हूँ
उन फिसलन भरी राहों  पर 
जहाँ लोग हाथों को थामते है अपने मतलब के लिये 
पैर भी खीचते है अपने मतलब के लिये 
कहने को तो सब अपने है 
लेकिन हकीकत में सब सपने है, सब सपने है।

मै अकेला हूँ 
उसी पगडण्डी पर जहाँ 
मिलते है सब नाकाब ओढ़े हुए
साथ चलते है परछाई छुपाये हुए 
लगे है एक - दुसरे को हराने में 
जहाँ हसतें भी है दुसरे को रुलाते हुए 
गर्मजोशी में गले लगाते है लोग 
चादर में खंजर छुपाये हुए 
बीच राहों में बाँहों मे भरते जिसे 
पौ फटते ही अनजान बनते है नजरे चुराते हुए 

मै अकेला हूँ 
उन्ही राहों पर 
जो कभी घाटी , कभी पहाडो से गुजरती है 
कभी बारिश में भीगती है 
कभी सूरज की गर्मी मे तपती है 
कभी - कभी सामना होता है बर्फीली हवाओं से 
तब याद कर चाँद को खुद मे सिमटती है 
उन यादों की पोटली के सहारे-सहारे  
मै अकेले - अकेले सरकता हूँ
वो सामने कब्रिस्तान की चारदीवारी नजर आती है 
अपने उस आखिरी मुकाम की तरफ 
अकेला, सिर्फ अकेला ही आगे बढ़ता हूँ।