Sunday, February 21, 2010

दर्दे .....१४११


हमें सचमुच चाहने वाले हमने नहीं देखे,
हमारें दर्दों को अपना समझने वाले हमने नहीं देखे,
हम पर राजनीती करने वाले तो हमने बहुत देखें है,
पर हमारें पैरों में पड़े छाले देखने वाले हमने नहीं देखे।

ये एक अजीब-सी विडंबना ही है कि जिसे हम अपना राष्ट्रीय पशु मानते है आज उसी के अस्तित्वा बचाने के लिये खुद से जूझ रहें हैं और हद तो तब हो जाती हैं जब खुद को देशभक्त करार देते है। इक समय था जब बचपन में माँ मुझे बाघ कि आवाज निकाल कर डराया करती थी जब मै रात रोने लगता था। कहती थी कि "बेटा चुप हो जा नहीं तो बाघ आ जायेगा" और मै डर कर चुप हो जाता था। और इक आज का समय है जब हमारे बच्चे उनकी आवाज सुन कर ताली बजाते हैं जिन्हें हम अपने शौक और शोहरत के लिये कैद कर दिए है। आज तो वो हमारे सामने ठीक से दहाड़ भी नहीं सकतें।
सोच के अजीब सा लगता है कि इक तरफ हम उनके आसियाने को उजाड़ के अपना बसेरा बनाते जा रहे है तो वही दूसरी तरफ उन्ही की तस्वीर अपने दिवार पर लगा कर कमरे की शोभा बढ़ाते है। ये भूल जाते है की हमारा असली घर तो ये धरती है और इसकी सुन्दरता के लिये प्राकृतिक ने सबकुछ बनाया है। हमें तो बस इसकी रखवाली करनी थी जिसे हम अपने फायदे के लिये उपयोग करते चले जा रहे है, भूखे दरिंदों की तरह निचोड़तें जा रहे है और टीवी और मीडिया के जरिये दिखाते है कि हमें इसकी फिक्र है और हम इसकी रखवाली कर रहे है जिसके अन्दर से भी अपने फायदे के लिये रचे गए चक्रब्यूह की बु आती है।
हम आज जाके जागे हैं जब बाघों की संख्या 40 हजार से केवल 1411 तक रह गई है।ये माना की केंद्र सरकार ने सन 1972 में टाइगर प्रोजेक्ट शुरू किया था, भारतीय वन्य जीव संस्थान और केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय की पहल पर बाघों का बसेरा भी बढाया गया था। बफर जोन भी बनाये गए थे जहा वो स्वछन्द घुम सके फिर भी हम उनके हालत में कोई सुधार नहीं कर सके क्योंकि हमारी बातें तो बस फाइलों और मीडिया में होती है। हवा में तीर चलाना तो कोई हमशे सीखे। मुझे ये कहते हुए शर्म आ रहा है कि आज जब हम अपने ही भाइयों और बहनों को मारने के लिये मंदिरों, ट्रेनों और बसों में बम फोड़ सकते है तो उनकी सुध कौन लेगा जो बोल नहीं सकते है, जो अपने आँखों से अपने रोज-रोज उजड़ते चमन को देख सिर्फ देख सकते हैं। उन्हें तो सलामत रखने के नाम पर हम किसी राष्ट्रीय उद्यान में लाके रख देते हैं जहा बस लिखा होता है कि जानवरों से छेड़-छाड़ ना करे लेकिन होता कुछ और है।
मुझे आज भी याद है जब मैं दसवी क्लास में था और मेरे घर के पास वाले मैदान में इक सर्कस आया था जहा मैंने पहली बार बाघ देखा था जो डंडे के डर से बकरी से भी प्यार कर रहा था। बचपन में माँ के जरिये तो तस्वीर बनी थी वो तुरंत ही गायब हो गई थी। अपनी उत्सुकता को समेटे हुए मै इक दिन उस तरफ चला गया जहाँ जानवरों को रखा गया था। जहाँ मुझे उनके उस घुटन भरे छोटे-छोटे पिंजरों के पास जाके खड़ा होने का मौका मिला। उनके मुरझाये चहरे और दुबले हो गये शरीर और वहा की असहनीय दुर्गन्ध को मै ज्यादा समय तक नहीं झेल सका और मै वापस आ गया। वापस आने के क्रम में मुझे बचपन में पढ़े हुए उस कविता के पंक्तिया सच लगने लगी की " हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिजर बंद ना गा पाएंगे।
दोष भी दे तो किसको दे। हममे तो ये आदत शुरू से ही है कि हम अपना दोष दूसरों के ऊपर थोपते है। अपना बचाव करते है। केंद्र सरकार अपनी गलती राज्य सरकार पर थोपती है तो राज्य सरकार, केंद्र सरकार पर थोपती है।
पुलिस किसी आम आदमी को मार कर आतंकवादी करार देती है और सचमुच के आतंकवादी से पैसे खाती है। ऐसा ही कुछ उन बाघों के साथ भी हुआ है जिसे कहने को तो हम अपना राष्ट्रीय पशु मानते है लेकिन उसी का तस्करी कर के अपने देशभक्त होने की मिशाल देते है। अपने फायदों के लिये उनका शिकार करते है और उसे आदमखोर करार कर देते है। और उनकी हिफाजत के नाम पर सरकार से पैसे भी लेते है।
ना चाहते हुए भी ये कहना पड़ रहा है की "रक्षक ही भक्षक बन गया है" जिसका नतीजा सामने है 40 हजार की जगह केवल और केवल 1411 शेष। इनकी भी कोई गारंटी नहीं है।
क्या हम अभी-भी इनको बचाने में असमर्थ हो जायेंगे? अगर ऐसा हुआ तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपनी आने वाली पीढियों को अपने राष्ट्रीय पशु की फिल्मे और अपने दीवारों पर टांगी तस्वीरे ही दिखा पाएंगे।
देश के युवा होने के नाते मेरी गुजारिश है की "जागो दोस्तों जागो, हमारे राष्ट्रीय पशु का अस्तित्वा खतरे में है"
उनकी माथे की लकीरे, उनके चिता हो बयां कर रही है,
उनकी आँखे मदद के लिये पुकार रही है.........
आओ आज हम अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर इनके लिये कुछ ऐसा करने की कसम खाए जो पुरे संसार में इक मिशाल बने।
shashi kant singh

1 comment:

  1. truely said shashi..and very nicely explained.

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